सतगुरु श्रद्धानंद सत्संग अपने नाम के अनुरुप ही पूर्णतः श्रद्धामय तथा आनंदमय है.
हिमालय स्थित तपोवन के महान तपस्वी संत सतगुरु श्रद्धानंद जी महाराज के कड़े त्याग व कठोर तप के फलस्वरुप , उनके सानिध्य– सामीप्य–अनुभव तथा सतगुरु श्रद्धानंद जी महाराज द्वारा मनोनीत संत आशीर्वाद एवं बख्शीश प्राप्त शिष्य संत अनूप महाराज द्वारा संचालित है . सतगुरु श्रद्धानंद सत्संग आश्रम बालसमंद रोड़, आर्यनगर हिसार 125001 हरियाणा में स्थित है.
सतगुरु श्रद्धानंद सत्संग आश्रम
तनावमुक्त –नशामुक्त– रोगमुक्त
स्वस्थ , सुखी और खुश घर ,परिवार तथा समाज हेतु सतत् प्रयत्नशील कर्मशील है.

परमसंत सतगुरु श्रद्धानंद जी महाराज महान सत् आत्माओं में से एक हैं जिन्होंने जवानी में कड़े त्याग एवं कठोर तप द्वारा पूर्णता प्राप्त की और प्रकृतिप्रदत श्रेष्ठता सिद्ध की.
मेरा परम सौभाग्य रहा है कि अपने काल के महान तपस्वी संत सतगुरु श्रद्धानंद जी ने मुझे अपना शिष्य चुना संत मनोनीत कर अपनी श्रेष्ठता पूर्णता सिद्धता
सौंपकर धन्य किया. श्रद्धानंद जी महाराज की श्रेष्ठता पूर्णता सिद्धता उनके सानिध्य और सामीप्य उनका आशीर्वाद उनकी बख्शीश का ही पुण्यफल है कि मैं भी विगत 12 वर्षों से निरंतर इसी सत्य–धर्म , पुण्य मानवता के पथ पर जन्म की सिद्धता पूर्णता तथा जीवन की सफलता हेतु प्रयत्नशील कर्मशील हूं.
मेरे साथ इस पथ पर मेरे सहयोगी 11वर्षों से रचना जिन्होंने पूर्णतः साधुत्व स्वीकार कर लिया है तथा समयानुसार निरंतर तप द्वारा तपस्विनी साध्वी रचना का रुप अख्तियार कर लिया है. इसी प्रकार से धर्मबीर जी पिछले 7 वर्षों से अपनी पारिवारिक और सांसारिकता को पूर्ण करते हुए सहयोगी बने हुए हैं दिनेश भी पिछले 5 वर्षों से अपनी शिक्षा बदस्तूर जारी रखते हुए तमाम घरेलू पारिवारिक और सामाजिक विरोधों को दरकिनार करते हुए सहयोगी बने हुए हैं इन सभी का सहयोग सराहनीय है अविस्मरणीय है. साध बिना संगत – संगत बिना साध नही आज मैं जो हूं जहां हूं जैसा हूं इनकी सेवा सहयोग से हूं.
मैं अपना सर्वस्व त्याग सतगुरु श्रद्धानंद जी महाराज के दिखाए बताए गए राह पर ही जीवनरत हूं.
समस्त जीव और संसार प्रकृति की उत्कृष्ट रचना है. प्रकृति जननी है और दात्री है.प्रकृति ही निरंतर अनुकूलता समता संतुलन है. प्रकृति से भिन्न किसी का कोई अस्तित्व वजूद नही है . मनुष्य से भिन्न समस्त जीव प्रकृति के साथ तालमेल बनाए रखते हैं जिससे उनका जीवन न केवल सफल पूर्ण होता है बल्कि वे जन्म का सर्वश्रेष्ठ ( मनुष्य जन्म )पाते हैं.
मनुष्य ही है जो श्रेष्ठता के अहंकारवश प्रकृति के विपरीत विभिन्नताओं में रहता है और जीता है. अन्य समस्त जीव अपने में समता में रहते जीते हैं लेकिन मनुष्य नही. प्रकृति से भिन्नता जीव के जीवन का सार नही है इसलिए ही मनुष्य ही है जो किसी विरले को छोड़ ऊपर नही जाता सफल नही होता है बल्कि निचली योनियों में जीवन जीने को मजबूर होता है. असल में मनुष्य ही मात्र प्राणी है जो अपने आपको अर्थात् मनुष्यता को ही नही जान समझ और सीख पाया है कि वह क्या है –क्यों है. श्रेष्ठ –सर्वश्रेष्ठ कहने या मान लेने भर से नही होता है अपितु श्रेष्ठता सिद्ध करनी होती है जबकि मनुष्य स्वयं को मान लेने वाला स्वयंभू है . खैर….. मनुष्य की गुणता के कारण यह संसार विभिन्नताओं का संसार है. श्रेष्ठ आत्माओं ने अपने सत्कर्म स्वधर्म की पालना के तौर पर प्रकृति को सतरुप में सम्राट से भिक्षु , राजसी पोशाक त्याग नग्न हो जाने, व्यापारी से दीन दुखियों का निस्वार्थ सेवक बनना स्वीकार किया.ऐसे अनेक किंतु विरले उदाहरण मानव संसार में है.

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सतगुरु श्रद्धानंद सत्संग आश्रम बालसमंद रोड़,आर्यनगर,

हिसार हरियाणा 125001.